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यक्ष प्रश्न – परिणाम

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यक्ष प्रश्न – प्रस्तावना

यक्ष प्रश्न – भाग (क)

यक्ष प्रश्न – भाग (ख)

 

यक्ष उवाच।

व्याख्यातः पुरुषो राजन्यश्च सर्वधनी नरः।

तस्मात्त्वमेकं भ्रातृणां यमिच्छसि स जीवतु ॥

  • यक्ष ने कहा- राजन् ! जो सबसे बढ़कर धनी पुरुष है, उसकी तुमने ठीक-ठीक व्याख्या कर दी; इसलिये अपने भाइयों में से जिस एक को तुम चाहो, वही जीवित हो सकता है।

युधिष्ठिर उवाच।

श्यामो य एष रक्ताक्षो बृहत्साल इवोत्थितः।

व्यूढोरस्को महाबाहुर्नकुलो यक्ष जीवतु ॥

  • युधिष्ठिर बोले- यक्ष ! यह जो श्यामवर्ण, अरुणनयन, सुविशाल शालवृक्ष के समान ऊँचा और चौड़ी छाती वाला महाबाहु नकुल है, वही जीवित हो जाय।

यक्ष उवाच।

प्रियस्ते भीमसेनोऽयमर्जुनो वः परायणम्।

त्वं कस्मान्नकुलं राजन्सापत्नं जीवमिच्छसि ॥

यस् नागसहस्रेण दशसङ्ख्येन वै बलम्।

तुल्यंतं भीममुत्सृज्य नकुलं जीवमिच्छसि ॥

तथैनं मनुजाः प्राहुर्भीमसेनं प्रियं तव।

अथ कनानुभावेन सापत्नं जीवमिच्छसि ॥

यस्य बाहुबलंसर्वेपाण्डवाः समुपासते।

अर्जुनं तमपाहाय नकुलं जीवमिच्छसि ॥

  • यक्ष ने कहा- राजन् ! यह तुम्हारा प्रिय भीमसेन है और यह तुम लोगों का सबसे बड़ा सहारा अर्जुन है; इन्हें छोड़कर तुम किसलिये सौतेले भाई नकुल को जिलाना चाहते हो ?
    जिसमें दस हजार हाथियों के समान बल है, उस भीम को छोड़कर तुम नकुल को ही क्यों जिलाना चाहते हो ? सभी मनुष्य भीमसेन को तुम्हारा प्रिय बतलाते हैं; उसे छोड़कर भला सौतेले भाई नकुल में तुम कौन सा सामथ्र्य देखकर उसे जिलाना चाहते हो ?
    जिसके बाहुबल का सभी पाण्डवों को पूरा भरोसा है, उसए अर्जुन को भी छोड़कर तुम्हें नकुल को जिला देने की इच्छा क्यों है ?

युधिष्ठिर उवाच।

धर्म एव हतो हन्ति ध्रमो रक्षति रक्षितः।

तस्माद्धऱ्मं न त्यजामि मा नो धर्मो हतोऽवधीत् ॥

आनृशंस्यं परो धर्मः परमार्थाच्चमे मतम्।

आनृशंस्यं चिकीर्षामि नकुलो यक्ष जीवतु ॥

धर्मशीलः सदा राजाइतिमां मानवा विदुः।

स्वधर्मान्न चलिष्यामि नकुलो यक्ष जीवतु ॥

कुन्ती चैव तु माद्री च द्वे भार्ये तु पितुर्मम।

उभे सपुत्रे स्यातां वै इतिमे धीयते मतिः ॥

यथा कुन्ती तथा माद्री विशेषो नास्ति मे तयोः।

मातृभ्यां सममिच्छामि नकुलो यक्ष जीवतु ॥

  • युधिष्ठिर बोले – यदि धर्म का नाश किया जाय, तो वह नष्ट हुआ धर्म ही कर्ता को भी नष्ट कर देता है और यदि उसकी रक्षा की जाय, तो वही कर्ता की भी रक्षा कर लेता है। इसी से मैं धर्म का त्याग नहीं करता कि कहीं नष्ट होकर वह धर्म मेरा ही नाश न कर दे।
    यक्ष ! मेरा ऐसा विचार है कि वस्तुतः अनृशंसता (दया तथा समता) ही परम धर्म है। यही सोचकर मैं सबके प्रति दया और समान भाव रखना चाहता हूँ; इसलिये नकुल ही जीवित हो जाय।
    यक्ष ! लोग मेरे विषय में ऐसा समझते हैं कि राजा युधिष्ठिर धर्मात्मा हैं; अतएव में अपने धर्म से विचलित नहीं होऊँगा। मेरा भाई नकुल जीवित हो जाय।
    मेरे पिता के कुन्ती और माद्री नाम की दो भार्याएँ रहीं। वे दोनों की पुत्रवती बनी रहें, ऐसा मेरा विचार है।
    यक्ष ! मेरे लिये जैसी कुन्ती है, वैसी ही माद्री । उन दोनों में कोई अन्तर नहीं है। मैं दोनों माताओं के प्रति समान भाव ही रखना चाहता हूँ। इसलिये नकुल ही जावित हो।

यक्ष उवाच।

यस् तेऽर्थाच्च कामच्च आनृशंस्यं परं मतम्।

तस्मात्ते भ्रातरः सर्वे जीवन्तु भरतर्षभ ॥

  • यक्ष ने कहा- भरतश्रेष्ठ ! तुमने अर्थ और काम से भी अधिक दया और समता का आदर किया है, इसलिये सभी भाई जीवित हो जायँ।

धन्यवाद

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लेख संदर्भ - गीता प्रेस एवं दक्षिणात्य महाभारत

Post Author: Mahabharata World

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