ये संवाद श्रीमान यक्ष (धर्म मूर्तिमान) और महाराज युधिष्ठिर के मध्य हुआ था जो की अत्यंत शूक्ष्म ज्ञान से परिपूर्ण हैं एवं सभी के लिए उपयोगी हैं ।

जब यक्ष रूपी धर्म ने महाराज पाण्डु के सभी पुत्र – भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव को मार डाला (मूर्क्षित) तब स्वंय युधिष्ठिर जल के लिए उस सरोवर के निकट पहुँचे जहाँ उनके चारों दिग्गज भ्राता जो की स्वंय भगवान इन्द्र और रूद्र के सामान थें और उनकी समानता करने वाला कोई वीर न था वे स्वंय ही अचेत थें एवं काल के निकट जा पहुँचे थें ।

जब महाराज युधिष्ठिर ने इन्द्र के समान गौरवशाली अपने भाइयों को सरोवर के तट पर निर्जीव की भाँति पड़े हुए देखा; मानो प्रलयकाल में सम्पूर्ण लोकपाल अपने लोकों से भ्रष्ट होकर गिर गये हों । वीरवर अर्जुन मरे पड़े थे; उनके धनुष-बाण (गांडीव धनुष) इधर बिखरे पड़े थे।

महाबली भीमसेन और सुन्दर नकुल-सहदेव भी प्राणरहित हो निश्चेष्ट हो गये थे। इन सबको देखकर युधिष्ठिर गरम-गरम लंबी साँसें खींचने लगे। उनके नेत्रों से शोक के आँसू उमड़कर उन्हें भिगो रहे थे।

अपने समस्त भ्राताओं को इस प्रकार धराशायी हुए देख महाबाहु धर्मपुत्र युधिष्ठिर गहरी चिन्ता में डूब गये और देर तक विलाप करते रहे ।

वे बोले- ‘महाबाहु वृकोदर ! तुमने यह प्रतिज्ञा की थी कि ‘मैं युद्ध में अपनी गदा से दुर्योधन की दोनों जाँघें तोड़ डालूँगा।’ महाबाहो ! तुम कुरुकुल की कीर्ति बढ़ाने वाले थे। तुम्हारा हृदय विशाल था। वीर ! आज तुम्हारे गिर जाने से मेरे लिये सब कुछ व्यर्थ हो गया ।

‘साधारण मनुष्यों की बातें तथा उनकी प्रतिज्ञाएँ तो झूठी निकल जाती हैं; परंतु तुम लोगों के सम्बन्ध में जो दिव्य वाणियाँ हुई थीं, वे कैसे मिथ्या हो सकती हैं?

‘‘धनंजय ! जब तुम्हारा जन्म हुआ था, उस समय देवताओं ने भी कहा था कि ‘कुन्ती ! तुम्हारा यह पुत्र सहस्त्रनेत्रधारी इन्द्र से भी किसी बात में कम न होगा।’ उत्तर परियात्र पर्वत पर सब प्राणियों ने तुम्हारे विषय में यही कहा था कि ‘ये अर्जुन शीघ्र ही पाण्डवों की खोयी हुई राजलक्ष्मी को पुनः लौटा लायेंगे। युद्ध में कोई भी इन पर विजय पाने वाला न होगा और ये भी किसी को परास्त किये बिना न रहेंगे’’।

‘वे ही महाबली अर्जुन आज मृत्यु के अधीन कैसे हो गये ? ये वे ही धनंजय मेरी आशा-लता को छिन्न-भिन्न करके धरती पर पड़े हैं; जिन्हें अपना रक्षक बनाकर और जिनका ही भारी भरोसा करके हमलोग ये सारे दुःख सहते आये हैं ।

कुंती के ये दोनों महाबली पुत्र भीमसेन और अर्जुन जो किसी भी अस्त्र से प्रतिहत न होने वाले, समरांगण में उन्मत्त होकर लड़ने वाले तथा सदैव शत्रुओं का संहार करने वाले वीर थे, वे आज सहसा शत्रु के अधीन कैसे हो गये?

‘मुझ दुष्ट का हृदय निश्चय की पत्थर और लोहे का बना हुआ है, जो कि आज इन दोनों भाई नकुल और सहदेव को धरती पर पड़ा देख विदीर्ण नहीं हो जाता है । ‘पुरुषसिंह बन्धुओं ! तुम लोग शास्त्रों के विद्वान्, देशकाल को समझने वाले, तपस्वी और कर्मठ वीर थे। अपने योग्य पराक्रम किये बिना ही तुम लोग (प्राणहीन हो) कैसे सो रहे हो ? तुम्हारे शरीर में कोई घाव नहीं है, तुमने धनुष-बाण का स्पर्श तक नहीं किया है तथा तुम किसी से परास्त होने वाले नहीं हो; ऐसी दशा में इस पृथ्वी पर संज्ञाशून्य होकर क्यों पड़े हो ?

परम बुद्धिमान युधिष्ठिर धरती पर पड़े हुए पर्वत शिखरों के समान अपने भाइयों को इस प्रकार सुख की नींद सोते देखकर बहुत दुखी हुए। उनके सारे अंगों में पसीना निकल आया और वे अत्यन्त कष्टप्रद अवस्था में पहुँच गये।

यह ऐसा ही होनहार है’, ऐसा कहकर धर्मात्मा राजा युधिष्ठिर शोकसागर में मग्न तथा व्याकुल होकर भाइयों की मृत्यु के कारण पर विचार करने लगे। वे यह भी सोचने लगे कि ‘अब क्या करना चाहिये?’

महाबुद्धिमान महाबाहु युधिष्ठिर देश और काल तत्त्व को पृथक्-पृथक् जानने वाले थे; तो भी बहुत सोचने विचारने पर भी वे किसी निश्चय पर नहीं पहुँच सके। तत्पश्चात् धर्मात्मा और तपस्वी धर्मपुत्र युधिष्ठिर अपने मन को स्थिर करके बहुत विलाप करने के पश्चात् अपनी बुद्धि द्वारा यह विचार करने लगे- ‘इन वीरों को किसने मार गिराया है ? इनके शरीर में अस्त्र शस्त्रो के आघात का कोई चिन्ह नहीं है और न इस स्थान पर किसी दूसरे के पैरों का निशान ही है। मैं समझता हूँ, अवश्य वह कोई भारी भूत है, जिसने मेरे भाइयों को मारा है।

इस विषय में मैं चित्त को एकाग्र करके फिर सोचूँगा अथवा पानी पीकर इस रहस्य को समझने की चेष्टा करूँगा। सम्भव है, दुर्योधन चुपके-चुपके कोई षड़यन्त्र किया हो। ‘अथवा जिसकी बुद्धि में सदा कुटिलता ही निवास करती है, उस गान्धारराज शकुनि की भी यह करतूत हो सकती है। जिसके लिये कर्तव्य औ अकर्तव्य दोनों बराबर हैं, उस अजितात्मा शकुनि पर कौन वीर पुरुष विश्वास कर सकता है ? अथवा गुप्तरूप से नियुक्त किये हुए पुरुषों द्वारा दुरात्मा दुर्योधन ने ही यह हिंसात्मक प्रयोग किया होगा’

इस प्रकार परम बुद्धिमान युधिष्ठिर भाँति-भाँति की चिन्ता करने लगे। (परीक्षा करने पर) उन्हें इस बात का निश्चय हो गया था कि इस सरोवर के जल में जहर नहीं मिलाया गया है। ‘क्योकि मर जाने पर भी मेरे इन भाइयों के शरीर में कोई विकृति नहीं उत्पन्न हुई है। अब भी मेरे इन भाइयों के मुख की कान्ति प्रसन्न है।’ इस तरह वे सोच-विचार में डूबे ही रहे।

मेरे इन पुरुषरत्न भाइयों में से प्रत्येक के शरीर में बल का अगाध सिन्धु लहराता था। आयु पूर्ण होने पर सबका अंत कर देने वाले यमराज के सिवा दूसरा कौन इनसे भिड़ सकता था?’ इस प्रकार निश्चय करके युधिष्ठिर जल में उतरे। पानी में प्रवेश करते ही उनके कानों में आकाशवाणी सुनायी दी।

यक्ष बोला- राजकुमार ! मैं सेवार और मछली खाने वाला बगुला हूँ। मैंने ही तुम्हारे छोटे भाइयों को यमलोक भेजा है; अतः मेरे पूछने पर यदि तुम मेरे प्रश्नों का उत्तर न दोगे, तो तुम भी यमलोक के अतिथि होआगे। तात ! जल पीने का साहस न करना। इस पर मेरा पहले से अधिकार हो गया है। कुन्तीकुमार ! मेरे प्रश्नों का उत्तर दो और जल पीओ और ले भी जाओ।

युधिष्ठिर बोले- मैं पूछता हूँ, तुम रुद्रो, वसुओं अथवा मरुद्गणों में से कौनसे देवता हो ? बताओ। यह काम किसी पक्षी का किया हुआ नहीं हो सकता? मेरे महातेजस्वी भाई हिमवान्, पारियात्र, विन्ध्य तथा मलय – इन चारों पर्वतों के समान हैं। इन्हें किसने मार गिराया है ? बलवानों में श्रेष्ठ वीर ! तुमने यह अत्यन्त महान् कर्म किया है। बड़े-बड़े युद्धों में जिन वीरों (के प्रभाव) को देवता, गन्धर्व, असुर तथा राक्षस भी नहीं सह सकते थे, उन्हें गिराकर तुमने परम अद्भुत पराक्रम किया है। तुम्हारा कार्य क्या है ? यह मैं नहीं जानता। तुम क्या चाहते हो ? इसका भी मुझे पता नहीं है। तुम्हारे विषय में मुझे महान् कौतूहल हो गया है। तुमसे मुझे कुछ भय भी लगने लगा है, जिससे मेरा हृदय उद्विग्न हो उठा है और सिर में संताप होने लगा है। अतः भगवन् ! मै विनयपूर्वक पूछता हूँ, तुम यहाँ कौन विराज रहे हो ?

यक्ष ने कहा- तुम्हारा कल्याण हो। मैं जलचर पक्षी नहीं हूँ, यक्ष हूँ। तुम्हारे ये सभी महान् तेजस्वी भाई मेरे द्वारा मारे गये हैं।

उस समय इस प्रकार बोलने वाले उस यक्ष की वह अमंगलमयी और कठोर वाणी सुनकर भरतश्रेष्ठ राजा युधिष्ठिर उसके पास जाकर खड़े हो गये। उन्होंने देखा, एक विकट नेत्रों वाला विशालकाय यक्ष वृक्ष के ऊपर बैठा है। वह बड़ा ही दुर्धर्ष, ताड़ के समान लंबा, अग्नि और सूर्य के समान तेजस्वी तथा पर्वत के समान ऊँचा है। वही अपनी मेघ के समान गम्भीर नादयुक्त वाणी से उन्हें फटकार रहा है। उसकी आवाज बहुत ऊँची है।

यक्ष ने कहा- राजन् ! तुम्हारे इन भाइयों को मैंने बार-बार रोका था; फिर भी ये बलपूर्वक जल ले जाना चाहते थे; इसी से मैंने इन्हें मार डाला। महाराज युधिष्ठिर ! यदि तुम्हें अपने प्राण बचाने की इच्छा हो, तो वहाँ जल नहीं पीना चाहिये। पार्थ ! तुम पानी पीने का साहस न करना, यह पहले से ही मेरे अधिकार की वस्तु है। कुन्तीनन्दन ! पहले मेरे प्रश्नों का उत्तर दो, उसके बाद जल पीओ और ले भी जाओ।

युधिष्ठिर ने कहा- यक्ष ! मैं तुम्हारे अधिकार की वस्तु को नहीं ले जाना चाहता। मैं स्वयं ही अपनी बड़ाई करूँ; इस बात की सत्पुरुष कभी प्रशंसा नहीं करते। मैं अपनी बुद्धि के अनुसार तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर दूँगा, तुम मुझसे प्रश्न करो!!

Pic CreditStar MB

लेख संदर्भ - गीता प्रेस महाभारत

आगे……….

यक्ष प्रश्न – भाग (क)

यक्ष प्रश्न – भाग (ख)

यक्ष प्रश्न – परिणाम

 

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