यक्ष प्रश्न – भाग (क)

युधिष्ठिर जो की बुद्धिमानों में श्रेष्ठ थें अपने बुद्धि के बल पर यह पता कर लिया की उनके भाइयों की मृत्यु असहज नहीं हैं ये अवश्य ही दैविक हैं और इसका संबंध जल के सरोवर से ही हैं और इसलिए वे स्वंय ही जल में प्रवेश करते हैं तभी बगुला रूपी यक्ष उनके सामने अवतरित होते हैं और इसके आगे परिचय प्राप्त होने के बाद उनके मध्य कुछ अतयंत ही गूढ़ प्रश्न और उत्तर का संवाद आरम्भ होता हैं ।

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यक्ष प्रश्न – प्रस्तावना

युधिष्ठिर उवाच।

न चाहं कामये यक्ष तव पूर्वपरिग्रहम् ॥

कामं नैतत्प्रसंसन्ति सन्तो हि पुरुषाः सदा।

यदात्मना स्वमात्मानं प्रशंसेत्पुरुषर्षभ।

यथाप्रज्ञं तु ते प्रश्नान्प्रतिवक्ष्यामि पृच्छ माम् ॥

  • यक्ष ! मैं तुम्हारे अधिकार की वस्तु को नहीं ले जाना चाहता। मैं स्वयं ही अपनी बड़ाई करूँ; इस बात की सत्पुरुष कभी प्रशंसा नहीं करते। मैं अपनी बुद्धि के अनुसार तुम्हारे प्रश्नों का उत्तर दूँगा, तुम मुझसे प्रश्न करो ।

यक्ष उवाच।

किंस्विदादित्यमुन्नयति के च तस्याभितश्चराः।

कश्चैनमस्तं नयतिकस्मिंश्च प्रतितिष्ठति ॥

  • यक्ष ने पूछा- सूर्य को कौन ऊपर उठाता (उदित) करता है , उसके चारों ओर कौन चलते हैं , उसे असत कौन करता है , और वह किसमें प्रतिष्ठित है ?

युधिष्ठिर उवाच।

ब्रह्मादित्यमुन्नयति देवास्तस्याभितश्चराः।

धर्मश्चास्तं नयति च सत्ये च प्रतितिष्ठति ॥

  • युधिष्ठिर बोले – ब्रह्म सूर्य को ऊपर उठाता (उदित करता) है, देवता उसके चारों ओर चलते हैं, धर्म उसे असत करता है और वह सत्य में प्रतिष्ठित है।

यक्ष उवाच।

केन स्विच्छ्रोत्रियो भवति केन स्विद्विन्दते महत्।

केन स्विद्द्वितीयवान्भवतिराजन्केन च बुद्दिमान् ॥

  • यक्ष ने पूछा – राजन् ! मनुष्य श्रोत्रिय किससे होता है , महत्पद किसके द्वारा प्राप्त करता है ? वह किसके द्वारा द्वितीयवान् होता है ? ओर किससे बुद्धिमान होता है?

 

युधिष्ठिर उवाच।

श्रुतेन श्रोत्रियो भति रतपसा विन्दते महत्।

धृत्या द्वितीयवान्भवति बुद्धिमान्वृद्धसेवया ॥

  • युधिष्ठिर बोले – वेदाध्ययन के द्वारा मनुष्य श्रोत्रिय होता है, तप से महत्पद प्राप्त करता है, धैर्य से द्वितीवान् (दूसरे साथी से युक्त) होता है और वृद्ध पुरुषों की सेवा में बुद्धिमान होता है।

यक्ष उवाच।

किं ब्राह्मणानां देवत्वं कश्च धर्मः सतामिव।

कश्चैषां मानुषो भावः किमेषामसतामिव ॥

  • यक्ष ने पूछा- ब्राह्मणों में देवत्व क्या है , उनमें सत्पुरुषों सा धर्म क्या है? उनका मनुष्य-भाव क्या है , और उनमें असत्पुरुषों का सा आचरण क्या है ?

युधिष्ठिर उवाच।

स्वाध्याय एषां देवत्वं तप एषां सतामिव।

मरणं मानुषो भावः परिवादोऽसतामिव ॥

  • युधिष्ठिर बोले – वेदों का स्वाध्याय ही ब्राह्मणों में देवत्व है, तप सत्पुरुषों का सा धर्म है, मरना मनुष्य भाव है और निन्दा करना असत्पुरुषों का सा आचरण है।

यक्ष उवाच।

किं क्षत्रियाणां देवत्वं कश्च धर्मः सतामिव।

कश्चैषां मानुषो भावः किमेषामसतामिव ॥

  • यक्ष ने पूछा- क्षत्रियों में देवत्व क्या है, उनमें सत्पुरुषों सा धर्म क्या है ? उनका मनुष्य-भाव क्या है , और उनमें असत्पुरुषों का सा आचरण क्या है ?

युधिष्ठिर उवाच।

इष्वस्त्रमेषां देवत्वं यज्ञ एषां सतामिव।

भयं वै मानुषो भावः परित्यागोऽसतामिव ॥

  • युधिष्ठिर बोले- बाणविद्या क्षत्रियों का देवत्व है, यज्ञ उनका सत्पुरुषों का सा धर्म है, भय मानवीय भाव है और शरण में आये हुए दुखियों का परित्याग कर देना उनमें असत्पुरुषों का सा आचरण है।

यक्ष उवाच।

किमेकं यज्ञियं साम किमेकं यज्ञियं यजुः।

का चैषां वृणुते यज्ञं कां यज्ञो नातिवर्तते ॥

  • यक्ष ने पूछा- कौन एक वस्तु यज्ञिय साम है , कौन एक (यज्ञ सम्बन्धी) यज्ञिय है , कौन एक वस्तु यज्ञ का वरण करती है ? और किस एक का यज्ञ अतिक्रण नहीं करता ?

युधिष्ठिर उवाच।

प्राणो वै यज्ञियंसाम मनो वै यज्ञियं यजुः।

ऋगेका वृणुते यज्ञं तां यज्ञो नातिवर्तते ॥

  • युधिष्ठिर बोले- प्राण ही यज्ञिय साम है, मन ही यज्ञसम्बन्धी यजु है, एकमात्र ऋचा ही यज्ञ का वरण करती है और उसी का यज्ञ अतिक्रमण नहीं करा।

यक्ष उवाच।

किंस्विदावपतां श्रेष्ठं रकिंस्विन्निवपतां वरम्।

किंस्वित्प्रतिष्ठमानानां किस्वित्प्रसवतांवरम् ॥

  • यक्ष ने पूछा- खेती करने वालों के लिये कौन सी वस्तु श्रेष्ठ है ? बिखेरने (बोने) वालों के लिये क्या श्रेष्ठ है ? प्रतिष्ठा-प्राप्त धनियों के लिये कौन सी वस्तु श्रेष्ठ है ? तथा संतानोत्पादन करने वालों के लिये क्या श्रेष्ठ है ?

युधिष्ठिर उवाच।

वर्षमावपतां श्रेष्ठं बीजं निवपतां वरम्।

गावः प्रतिष्ठमानानां पुत्रः प्रसवतां वरः ॥

  • युधिष्ठिर बोले- खेती करने वालों के लिये वर्षा श्रेष्ठ है। बिखेरने (बोने) वालों के लिये बीज श्रेष्ठ है। प्रतिष्ठाप्राप्त धनियों के लिये गौ (का पालन-पोषण और संग्रह) श्रेष्ठ है और संतानोत्पादन करने वालों के लिये पुत्र श्रेष्ठ है।

यक्ष उवाच।

इन्द्रियार्थाननुभवन्बुद्धिमाँल्लोकपूजितः।

संमतः सर्वभूतानामुच्छ्वसन्को न जीवति ॥

  • यक्ष ने पूछा- ऐसा कौन पुरुष है, जो बुद्धिमान्, लोक में सम्मानित और सब प्राणियों का माननीय होकर एवं इन्द्रियों के विषयों को अनुभव करते तथा श्वास लेते हुए भी वास्तव में जीवित नहीं हैं ?

युधिष्ठिर उवाच।

देवतातिथिभृत्यानां पितॄणामात्मनश्च यः।

न निर्वपति पञ्चानामुच्छ्वसन्न स जीवति ॥

  • युधिष्ठिर बोले- जो देवता, अतिथि, भरणीय कुटुम्बीजन, पितर और आत्मा – इन पाँचों का पोषण नहीं करता, वह श्वास लेने पर भी जीवित नहीं है।

यक्ष उवाच।

किंस्विद्गुरुतरं भूमेः किंस्विदुच्चतरं च स्वात्।

किंस्विच्छीघ्रतरं वायोः किंस्विद्बहुतरं तृणात् ॥

  • यक्ष ने पूछा – पुथ्वी से भी भारी क्या है ? आकाश से भी ऊँचा क्या है ? वायु से भी तेज चलनेवाला क्या है ? और तिनकों से भी अणिक (असंख्य) क्या है ?

युधिष्ठिर उवाच।

माता गुरुतरा भूमेः खात्पितोच्चतरस्तथा।

मनः शीघ्रतरं वाताच्चिन्ता बहुतरी तृणात् ॥

  • युधिष्ठिर बोले – माता का गौरव पृथ्वी से भी अधिक है। पिता आकाश से भी ऊँचा है। मन वायु से भी तेज चलने वाला है और चिन्ता तिनकों से भी अधिक असंख्य एवं अनन्त है।

यक्ष उवाच।

किंस्वित्सुप्तं न निमिषति किंस्विज्जातं न चेङ्गते।

कस्यस्विद्धृदयं नास्तिकास्विद्वेगेन वर्धते ॥

  • यक्ष ने पूछा- कौन सोने पर भी आँखें नहीं मूंदता ? उत्पन्न होकर भी कौन चेष्टा नहीं करता ? किसमें हृदय नहीं है ? और कौन वेग से बढ़ता है।

युधिष्ठिर उवाच।

मत्स्यः सुप्तो न निमिषत्यण्डं जातं न चेङ्गते।

अश्मनो हृदयंनास्ति नदी वेगेन वर्धते ॥

  • युधिष्ठिर बोले – मछली सोने पर भी आँखें नहीं मूँदती, अण्डा उत्पन्न होकर भी चेष्टा नहीं करता, पत्थरों में हृदय नहीं है और नदी वेग से आगे बढ़ती है।

यक्ष उवाच।

किंस्वित्प्रवसतो मित्रं किंस्विन्मित्रं गृहे सतः।

आतुरस् च किं मित्रं किंस्विन्मित्रं मरिष्यतः ॥

  • यक्ष ने पूछा- प्रवासी (परदेश के यात्री)का मित्र कौन है ? गृहवासी (गृहस्थ) का मित्र कौन है ? रोगी का मित्र कौन है ? और मृत्यु के समीप पहुँचे हुए पुरुष का मित्र कौन है ?

युधिष्ठिर उवाच।

विद्या प्रवसतो मित्रं भार्या मित्रं गृहे सतः।

आतुरस्य भिषङ्भित्रं दानं मित्रं मरिष्यतः ॥

  • युधिष्ठिर बोले- सहयात्रियों का समुदाय अथवा साथ में यात्रा करने वाला साथी ही प्रवासी मित्र है, पत्नी गृहवासी का मित्र है, वैद्य रोगी का मित्र है और दान मुमूर्षु (अर्थात् मरनेवाले) मनुष्य का मित्र है।

यक्ष उवाच।

कोऽतिथिः सर्वभूतानां किं स्विद्धर्मं सनातनम्।

अमृतं किंस्विद्राजेन्द्रकिंस्वित्सर्वमिदं जगत् ॥

  • यक्ष ने पूछा- राजेन्द्र ! समसत प्राणियों का अतिथि कौन है ? सनातन धर्म क्या है ? अमृत क्या है , और वह सारा जगत् क्या है ?

युधिष्ठिर उवाच।

अतिथिः सर्वभूतानामग्निः सोमो गवामृतम्।

सनातनोऽमृतो धर्मो वायुः सर्वमिदं जगत् ॥

  • युधिष्ठिर बोले- अग्नि समसत प्राणियों का अतिथि है, गौ का दूध अमृत है, अविनाशी नित्य धर्म ही सनातन धर्म है और वायु यह सारा जगत् है।

यक्ष उवाच।

किंस्विदेको विचरते जातः को जायते पुनः।

किंस्विद्धिमस्य भैषज्यं किंस्विदावपनं महत् ॥

  • यक्ष ने पूछा- अकेला कौन विचरता है ? एक बार उत्पन्न होकर पुनः कौन उत्पन्न होता है ? शीत की औषधि क्या है ? और महान् आवपन (क्षेत्र) क्या है ?

युधिष्ठिर उवाच।

सूर्य एको विचरते चन्द्रमा जायते पुनः।

अग्निर्हमस्य भैषज्यं भूमिरावपनं महत् ॥

  • युधिष्ठिर बोले- सूर्य अकेला विचरता है, चन्द्रमा एक बार जन्म लेकर पुनः जन्म लेता है, अग्नि शीत की औषधि है और पृथ्वी बड़ा भारी आवपन है।

यक्ष उवाच।

किंस्विदेकपदं धर्म्यं किंस्विदेकपदं यशः।

किंस्विदेकपदं स्वर्ग्यं किंस्विदेकपदं सुखम् ॥

  • यक्ष ने पूछा – धर्म का मुख्य स्थान क्या है ? यश का मुख्य स्थान क्या है ? स्वर्ग का मुख्य स्थान क्या है ? और सुख का मुख्य स्थान क्या है ?

युधिष्ठिर उवाच।

दाक्ष्यमेकपदं धर्म्यं दानमेकपदं यशः।

सत्यमेकपदं स्वर्ग्यं शीलमेकपदंसुखम् ॥

  • युधिष्ठिर बोले- धर्म का मुख्य स्थान दक्षता है, यश का मुख्य स्थान दान है, स्वर्ग का मुख्य स्थान सत्य है और सुख का मुख्य स्थान शील है।

यक्ष उवाच।

किंस्विदात्मा मनुष्यस् किंस्विद्दैवकृतः सखा।

उपजीवनं किस्विदस् किंस्विदस्य परायणम् ॥

  • यक्ष ने पूछा- मनुष्य की आत्मा क्या है ? इसका दैवकृत सखा कौन है ? इसका उपजीवन (जीवन का सहारा) क्या है ? और इसका परम आश्रय क्या है ?

युधिष्ठिर उवाच।

पुत्र आत्मा मनुष्यस्य भार्या दैवकृतः सखा।

उपजीवनं च पर्जन्यो दानमस् परायणम् ॥

  • युधिष्ठिर बोले- पुत्र मनुष्य की आत्मा है, स्त्री इसकी दैवकृत सहचरी है, मेघ उपजीवन है और दान इसका परम आश्रय है।

यक्ष उवाच।

धन्यानामुत्तमं किंस्विद्धनानां स्यात्किमुत्तमम्।

लाभानामुत्तमं किंस्यात्सुखानां स्यात्किमुत्तमं ॥

  • यक्ष ने पूछा- धन्यवाद के योग्य पुरुषों में उत्तम गुण क्या है ? धनों में उत्तम धन क्या है ? लाभों में प्रधान लाभ क्या है ? और सुखों में उत्तम सुख क्या है ?

युधिष्ठिर उवाच।

धन्यानामुत्तमं दाक्ष्यंधनानामुत्तमं श्रुतम्।

लाभानां श्रेय आरोग्यं सुखानां तुष्टिरुत्तमा ॥

  • युधिष्ठिर बोले- धन्य पुरुषों में दक्षता ही उत्तम गुण है, धनों में शास्त्रज्ञान प्रधान है, लाभों में आरोग्य श्रेष्ठ है और सुखों में संतोष ही उत्तम सुख है।

यक्ष उवाच।

किंस्विद्धर्मपरंलके कश्च धर्मः सदाफलः।

किं नियम्य न शोचन्ति कैश् सन्धिर्न जीर्यते ॥

  • यक्ष ने पूछा- लोक में श्रेष्ठ कर्म क्या है , नित्य फल वाला धर्म क्या है ? किसको वश में रखने से मनुष्य शोक नहीं करते , और किनके साथ की हुई मित्रता नष्ट नहीं होती ?

युधिष्ठिर उवाच।

आनृशंस्यं परं धर्मात्रेताधर्मः सदाफलः।

मनो यम्य न शोचन्ति सन्धिः सद्भिर्न जीर्यते ॥

  • युधिष्ठिर बोले – लोक में दया श्रेष्ठ धर्म है, वेदोक्त धर्म नित्य फलवाला है, मन को वश में रखने से मनुष्य शोक नहीं करते और सत्पुरुषों के साथ की हुई मित्रता नष्ट नहीं होती।

यक्ष उवाच।

किंनु हित्वाप्रियो भवति किंनु हित्वा न शोचति।

किंनु हित्वाऽर्थवान्भवति किंनु हित्वा सुखी भवेत् ॥

  • यक्ष ने पूछा- किस वस्तु को त्यागकर मनुष्य प्रिय होता है ? किसको त्यागकर शोक नहीं करता , किसको त्यागकर वह अर्थवान होता है ? और किसको त्यागकर सुखी होता है ?

युधिष्ठिर उवाच।

मानं हित्वाप्रियो भवति क्रोधं हित्वा न शोचति।

कामं हित्वाऽर्थवान्भवति लोमं हित्वा सुखी भवेत् ॥

  • युधिष्ठिर बोले – मान को त्याग देने पर मनुष्य प्रिय होता है, क्रोध को त्यागकर शोक नहीं करता, काम को त्यागकर वह अर्थवान् होता है और लोभ को त्यागकर सुखी होता है।

यक्ष उवाच।

किमर्थं ब्राह्मणे दानं किमर्थं नटनर्तके।

किमर्थं चैव भृत्येषु किमर्थं चैव राजसु ॥

  • यक्ष ने पूछा- ब्राह्मण को क्यों दान दिया जाता हैं ? नट और नर्तकों को क्यों दान देते हैं ? सेवकों को दान देने का क्या प्रयोजन है ? और राजाओं को क्यों दान दिया जाता है ?

युधिष्ठिर उवाच।

धर्मार्थं ब्राह्मणे दानं यशोर्थं नटनर्तके।

भृत्येषु सङ्ग्रहार्थं च भयार्थं चैव राजसु ॥

  • युधिष्ठिर बोले- ब्राह्मण को धर्म के लिये दान दिया जाता हैं , नट और नर्तकों को यश के लिये दान (धन) देते हैं सेवकों को उनके भरण-पोषण के लिये दान (वेतन) दिया जाता है और राजाओं को भय के कारण दान (कर) देते हैं।

यक्ष उवाच।

अज्ञानेनावृतोलोकस्तमसा न प्रकाशते।

लोभात्त्यजतिमित्राणि सङ्गात्स्वर्गं न गच्छति ॥

  • यक्ष ने पूछा- जगत् किस वस्तु से ढका हुआ है ? किसके कारण वह प्रकाशित नहीं होता ? मनुष्य मित्रों को किसलिये त्याग देता है ? और स्वर्ग में किस कारण नहीं जाता है ?

 

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लेख संदर्भ - गीता प्रेस एवं दक्षिणात्य महाभारत



आगे……….

यक्ष प्रश्न – भाग (ख)

यक्ष प्रश्न – परिणाम

 

Post Author: Mahabharata World

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