यक्ष प्रश्न – भाग (ख)

भीेमसेन उस स्थान पर गये, जहाँ वे पुरुषसिंह तीनों भाई पृथ्वी पर पड़े थे। उन्हें उस अवस्था में देखकर भीमसेन को बड़ा दुःख हुआ। इधर प्यास भी उन्हें बहुत कष्ट दे रही थी । महाबाहु भीमसेन मन-ही-मन यह निश्चय किया कि ‘यह यक्षों तथा राक्षसों का काम है।’ फिर उन्होंने सोचा; ‘आज निश्चय ही मुझे शत्रु के साथ युद्ध करना पड़ेगा, अतः पहले जल तो पी लूँ।’ ऐसा निश्चय करके प्यासे नरश्रेष्ठ कुन्तीकुमार भीमसेन जल की ओर दौड़े।

“रुक जाओ तात!!”

यक्ष फिर से बोला – “तात ! पानी पीने का साहस न करना। इस जल पर पहले मेरा अधिकार स्थापित हो चुका है। कुन्तीकुमार ! पहले मेरे प्रश्नो का उत्तर दे दो, फिर पानी पी पीओ और ले भी जाओ ।” अमित तेजस्वी यक्ष के ऐसा कहने पर भी भीमसेन उन प्रश्नों का उत्तर दिये बिना ही जल पीने लगे और पीते ही मूर्छित होकर गिर पड़े ।

तदनन्तर कुन्तीकुमार पुरुषरत्न महाबाहु राजा युधिष्ठिर बहुत देर तक सोच-विचार करके उठे और जलते हुए हृदय से उन्होंने उस विशाल वन में प्रवेश किया, जहाँ मनुष्यों की आवाज तक नहीं सुनायी देती थी। वहाँ रुरु मृग, वराह तथा पक्षियों के समुदाय ही निवास करते थे।

नीले रंग के चमकीले वृक्ष उस वन की शोभा बढ़ा रहे थे। भ्रमरों के गुंजन और विहंगों के कलरव से वह वनप्रान्त शब्दायमान हो रहा था । महायशस्वी श्रीमान् युधिष्ठिर ने उस वन में विचरण करते हुए उस सरोवर को देखा, जो सुनहरे रंग के कुसुम केसरों से विभूषित था। जान पड़ता था; साक्षात् विश्वकर्मा ने ही उसका निर्माण किया है ।

उस सरोवर का जल कमल की वेलों से आच्छादित हो रहा था और उसके चारों किनारों पर सिंदुवार, बेंत, केवड़े, करवीर तथा पीपल के वृक्ष उसे घेरे हुए थे। उस समय भाइयों से मिलने के लिये उत्सुक श्रीमान् धर्मनन्दन युधिष्ठिर थकावट से पीडि़त हो उस सरोवर पर आये और वहाँ की अवस्था देखकर बड़े विस्मित हुए ।

इस प्रकार चारों भाइयों के मृत शरीर को जांच परख लेने के पश्चात उनका मिलन अब श्रीमान यक्ष से हुआ है जिसके साथ प्रश्न और उत्तर का संवाद प्राम्भ हो चूका हैं।

पढ़े –

यक्ष प्रश्न – प्रस्तावना

यक्ष प्रश्न – भाग (क)

यक्ष उवाच।

अज्ञानेनावृतोलोकस्तमसा न प्रकाशते।

लोभात्त्यजतिमित्राणि सङ्गात्स्वर्गं न गच्छति ॥

  • यक्ष ने पूछा- जगत् किस वस्तु से ढका हुआ है ? किसके कारण वह प्रकाशित नहीं होता ? मनुष्य मित्रों को किसलिये त्याग देता है ? और स्वर्ग में किस कारण नहीं जाता है ?

युधिष्ठिर उवाच।

अज्ञानेनावृतोलोकस्तमसा न प्रकाशते।

लोभात्त्यजतिमित्राणि सङ्गात्स्वर्गं न गच्छति ॥

  • युधिष्ठिर बोले- जगत् आज्ञान से ढका हुआ है, तमोगुण के कारण वह प्रकाशित नहीं होता, लोभ के कारण मनुष्य मित्रों को त्याग देता है और आसक्ति के कारण स्वर्ग में नहीं जाता। यक्ष उवाच।

मृत कथं स्यात्पुरुषः कथं राष्ट्रं मृतं भवत्।

श्राद्धं मृतंकथं वा स्यात्कथं यज्ञा मृतो भवेत् ॥

  • यक्ष ने पूछा- पुरुष किस प्रकारमरा हुआ कहा जाता है ? राष्ट्र किस प्रकार मर जाता है , श्राद्ध किस प्रकार मृत हो जाता है ? और यज्ञ कैसे नष्ट हो जाता है ?

युधिष्ठिर उवाच।

मृतो दरिद्रः पुरुषोमृतंराष्ट्रमराजकम्।

मृतमश्रोत्रियं श्राद्धं मृतो यज्ञस्त्वदक्षिणः ॥

  • युधिष्ठिर बोले – दरिद्र पुरुष मरा हुआ है यानी मरे हुए के समान है, बिना राजा का राज्य मर जाता है यानी नष्ट हो जाता है, श्रोत्रिय ब्राह्मण के बिना श्राद्ध मृत हो जाता है और बिना दक्षिणा का यज्ञ नष्ट हो जाता है।

यक्ष उवाच।

का दिक्किमुदकंपार्थ किमन्नं किंच वै विषम्।

श्राद्धस् कालमाख्याहि ततः पिब हरस्व च ॥

  • यक्ष ने पूछा- दिशा क्या है ? जल क्या है ? अन्न क्या है ? विष क्या है ? और श्राद्ध का समय क्या है ? यह बताओ। इसके बाद जल पीओ और ले भी जाओ।

युधिष्ठिर उवाच।

सन्तो दिग्जलमाकाशं गौरन्नं ब्राह्मणं विषम्।

श्राद्धस्य ब्राह्मणः कालः कथं वा यक्ष मन्यसे ॥

  • युधिष्ठिर बोले- सत्पुरुष दिशा हैं, आकाश जल है, पृथ्वी अन्न है, प्रार्थना (कामना) विष है और ब्राह्मण ही श्राद्ध का समय है अथवा यक्ष ! इस विषय में तुम्हारी क्या मान्यता है ?

यक्ष उवाच।

तपः किंलक्षणं प्रोक्तं को दमश्च प्रकीर्तितः।

क्षमा च का परा प्रोक्ता का च ह्रीः परिकीर्तिता ॥

  • यक्ष ने पूछा- तप का क्या लक्षण बताया गया है ? दम किसे कहते हैं ? और लज्जा किसको कहा गया है ? युधिष्ठिर उवाच।

युधिष्ठिर उवाच।

तपः स्वधर्मवर्तित्वं मनसो दमनं दमः।

क्षमा द्वन्द्वसहिष्णुत्वंहीरकार्यनिवर्तनम् ॥

  • युधिष्ठिर बोले- अपने धर्म में तत्पर रहना तप है, मन के दमन का ही नाम दम है, सर्दी-गर्मी आदि द्वन्द्वों का सहन करना क्षमा है तथा न करने योग्य काम से दूर रहना लज्जा है।

यक्ष उवाच।

किं ज्ञानं प्रोच्यते राजन्कः शमश्च प्रकीर्तितः।

दया च का परा प्रोक्ता किं चार्जवमुदाहृतम् ॥

  • यक्ष ने पूछा- राजन् ! ज्ञान किसे कहते हैं ? शम क्या कहलाता है ? उत्तम दया किसका नाम है ? और आर्जन (सरलता) किसे कहते हैं ?

युधिष्ठिर उवाच।

ज्ञानं तत्त्वार्थसम्बोधः शमश्चित्तप्रशान्तता।

दयासर्वसुखैपित्वमार्जवं समचित्तता ॥

  • युधिष्ठिर बोले- परमात्मतत्व का यथार्थ बोध ही ज्ञान है, चिता की शान्ति ही शम है, सबके सुख ही इच्छा रखना ही उत्तम दया है और समचित्त होना ही आर्जन (सरलता) है।

यक्ष उवाच।

कः शत्रुर्दुर्जयः पुंसां कश्चव्याधिरनन्तकः।

कीदृशश्च स्मृतः साधुरसाधुः कीदृशः स्मृतः ॥

  • यक्ष ने पूछा- मनुष्यों में दुर्जय शत्रु कौन है ? अनन्त व्याधि क्या है ? साधु कौन माना जाता है ? और असाधु किसे कहते हैं ?

युधिष्ठिर उवाच।

क्रोधः सुदुर्जयः शत्रुर्लोभोव्याधिरनन्तकः।

सर्वभूतहितः साधुरसाधुर्निर्दयः स्मृतः ॥

  • युधिष्ठिर बोले- क्रोध दुर्जय शत्रु है, लोभ अनन्त व्याधि है तथा जो समस्त प्राणियों का हित करनेवाला हो, वही साधु है और निर्दयी पुरूष को ही असाधु माना गया है ।

यक्ष उवाच।

को मोहः प्रोच्यते राजन्कश् मानः प्रकीर्तितः।

किमालस्यं च विज्ञेयं कश्चशोकः प्रकीर्तितः ॥

  • यक्ष ने पूछा- राजन् ! मोह किसे कहते हैं ? मान क्या कहलाता है ? आलस्य किसे जानना चाहिये ? और शोक किसे कहते हैं ?

युधिष्ठिर उवाच।

मोहो हिधर्ममूढ्तवंमानस्त्वात्माभिमानिता।

धर्मनिष्क्रियताऽऽलस्यं शोकस्त्वज्ञानमुच्यते ॥

  • युधिष्ठिर बोले- धर्म मूढ़ता ही मोह है, आत्माभिमान ही मान है, धर्म का पालन न करना आलस्य है और अज्ञान को ही शोक कहते हैं।

यक्ष उवाच।

किं स्थैर्यमृषिभिः प्रोक्तं किं च धैर्यमुदाहृतम्।

स्नानं च किं परं प्रोक्तं दानं च किमिहोच्यते ॥

  • यक्ष ने पूछा- ऋषियों ने स्थिरता किसे कहा है ? धैर्य क्या कहलाता है ? परम स्नान किसे कहते हैं ? और दान किसका नाम है ?

युधिष्ठि उवाच।

स्वधर्मे स्थिरता स्थैर्यं धैर्यमिन्द्रियनिग्रहः।

स्नानं मनोमलत्यागो दानं वै भूतरक्षणम् ॥

  • युधिष्ठिर बोले- अपने धर्म में स्थिर रहना ही स्थिरता है, इन्द्रियनिग्रह धैर्य है, मानसिक मलों का त्याग करना परम स्नान है और प्राणियों की रक्षा करना ही दान है ।

यक्ष उवाच।

कः पण्डिः पुमान्ज्ञेयो नास्तिकः कश्च उच्यते।

को मूर्खः कश्चकामः स्यात्को मत्सर इति स्मृतः ॥

  • यक्ष ने पूछा- किस पुरुष को पण्डित समझना चाहिये ? नास्तिक कौन कहलाता हे ? मूर्ख कौन है ? काम क्या है ? तथा मत्सर किसे कहते हैं ?

युधिष्ठिर उवाच।

धर्मज्ञः पण्डितो ज्ञेयो नास्तिको मूर्ख उच्यते।

कामः संसारहेतुश्च हृत्तापो मत्सरः स्मृतः ॥

  • युधिष्ठिर बोले- धर्मज्ञ को पण्डित समझना चाहिये, मूर्ख नास्तिक कहलाता है और नास्तिक मूर्ख है तथा जो जन्म मरण रूप संसार का कारण है, वह वासना काम है और हृदय की जलन ही मत्सर है। यक्ष उवाच।

यक्ष उवाच।

कोऽहंकार यइतिप्रोक्तः कश्च दम्भः प्रकीर्तितः।

किं तद्दैवं परं प्रोक्तं किं तत्पैशुन्यमुच्यते ॥

  • यक्ष ने पूछा- अहंकार किसे कहते हैं ? दम्भ क्या कहलाता है ? जिसे परम दैवउ कहते हैं, वह क्या है ? और पैशुन्य किसका नाम है ? युधिष्ठिर उवाच।

युधिष्ठिर उवाच।

महाऽज्ञानमहंकारो दम्भो धर्मो ध्वजोच्छ्रयः।

दैवं रदानफलं प्रोक्तं पैशुन्यं परदूषणम् ॥

  • युधिष्ठिर बोले – महान् अज्ञान अहंकार है, अपने को झूठ-मूठ बड़ा धर्मात्मा प्रसिद्ध करना दम्भ है, दान का फल दैव कहलाता है और दूसरो को दोष लगाना पैशुन्य (चुगली) है।

यक्ष उवाच।

धर्मश्चार्थश्च कामश्च परस्परविरोधिनः।

एषां नित्यविरुद्धानां कथमेकत्र संगमः ॥

  • यक्ष ने पूछा- धर्म, अर्थ और काम- ये सब परस्पर विरोधी हैं। इन नित्य विरुद्ध पुरुषों का एक स्थान पर कैसे संयोग हो सकता है ?

युधिष्ठिर उवाच।

यदा धर्मश्भार्या च परस्परवशानुगौ।

तदा धर्मार्थकामानां त्रयाणामपि संगमः ॥

  • युधिष्ठिर बोले- जब धर्म और भार्या – ये दोनों परस्पर अविरोधी होकर मनुष्य के वश में हो जाते हैं, उस समय धर्म, अर्थ और काम- इन तीनों तीनों परस्पर विरोधियों का भी एक साथ रहना सहज हो जाता है।

यक्ष उवाच।

अक्षयोनरकः केन प्राप्यते भरतर्षभ।

एतन्मे पृच्छतः प्रश्नं तच्छीघ्रं वक्तुमर्हसि ॥

  • यक्ष ने पूछा- भरतश्रेष्ठ ! अक्षय नरक किस पुरुष को प्राप्त होता है , मेरे इस प्रश्न का शीघ्र ही उत्तर दो।

युधिष्ठिर उवाच।

ब्राह्मणं स्वयमाहूय याचमानमकिंचनम्।

पश्चान्नास्तीति योब्रूयात्सोक्षयंनरकं व्रजेत् ॥

वेदेषु धर्मशास्त्रेषु मिथ्या यो वै द्विजातिषु।

देवेषु पितृध्रमेषु सोऽक्षयंनरकं व्रजेत् ॥

विद्यमाने धने लोभाद्दानभोगविवर्जितः।

पश्चान्नास्तीति यो ब्रूयात्सोक्षयं नरकं व्रजेत् ॥

  • युधिष्ठिर बोले- जो पुरुष भिक्षा माँगने वाले किसी अकिंचन ब्राह्मण को स्वयं बुलाकर फिर उसे ‘नाहीं’कर देता है, वह अक्षय नरक में जाता है।
    जो पुरुष वेद, धर्मशास्त्र, ब्राह्मण, देवता और पितृधर्मों में मिथ्याबुद्धि रखता है, वह अक्षय नरक को प्राप्त होता है।
    धन पास रहते हुए भी जो लोभवश दान और भोग से रहित है तथा (माँगने वाले ब्राह्मणादि को एवं न्याययुक्त भोग के लिये स्त्री-पुत्रादि को) पीछे से यह कह देता है कि मेरे पास कुछ नहीं है, वह अक्षय नरक में जाता है।

यक्ष उवाच।

राजन्कुलेन वृत्तेन स्वाध्यायेन श्रुतेन वा।

ब्राह्मण्यं केन भवति प्रब्रूह्येतत्सुनिश्चितम् ॥

  • यक्ष ने पूछा- राजन् ! कुल, आचार, स्वाध्याय और शास्त्रश्रवण- इनमें से किसके द्वारा ब्राह्मणत्व सिद्ध होता है ? यह बात निश्चय करके बताओ।

युधिष्ठिर उवाच।

शृणु यक्ष कुलं तात न स्वाध्यायो न च श्रुतम्।

कारणं हि द्विजत्वेच वृत्तमेव न संशयः ॥

वृत्तं यत्नेन संरक्ष्यं ब्राह्मणेन विशेषतः।

अक्षीणवृत्तो न क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः ॥

पठकाः पाठकाश्चैव ये चान्ये शास्त्रचिन्तकाः।

सर्वे व्यसनिनो मूर्खा यः क्रियावान्स पण्डितः ॥

चतुर्वेदोऽपि दुर्वृत्तः स शूद्रादतिरिच्यते।

योऽग्निहोत्रपोर दान्तः स ब्राह्मण इति स्मृतः ॥

  • युधिष्ठिर बोले- तात यक्ष ! सुनो न तो कुल ब्राह्मणत्व में कारण है न स्वाध्याय और न शास्त्रश्रवण। ब्राह्मणत्व का हेतु आचार ही है, इसमें संशय नहीं है।
    इसलिये प्रयत्नपूर्वक सदाचार की ही रक्षा करनी चाहिये। ब्राह्मण को तो उसपर विशेषरूप से दृष्टि रखनी जरूरी है; क्योंकि जिसका सदाचार अक्षुण्ण है, उसका ब्राह्मणत्व भी बना हुआ है और जिसका आचार नष्ट हो गया, वह तो स्वयं भी नष्ट हो गया।
    पढ़ने वाले, पढ़ाने वाले तथा शास्त्र का विचार करने वाले- ये सब तो व्यसनी और मूर्ख ही हैं। पण्डित तो वही है, जो अपने (शास्त्रोक्त) कर्तवय का पालन करता है।
    चारों वेद पढ़ा होने पर भी जो दुराचारी है, वह अधमता में शुद्र से भी बढ़कर है। जो (नित्य) अग्निहोत्र में तत्पर और जितेन्द्रिय है, वही ‘ब्राह्मण’ कहा जाता है।

यक्ष उवाच।

प्रियवचनवादी किं लभते

विमृशितकार्यकरः किं लभते।

बहुमित्रकरः किं लभते

धर्मे रतः किं लभते कथय ॥

  • यक्ष ने पूछा- बताओ; मधुर वचन बोलने वाले को क्या मिलता है ? सोत्र विचारकर काम करने वाला क्या पा लेता है ? जो बहुत से मित्र बना लेता है, उसे क्या लाभ होता है ? और जो धर्मनिष्ठ है, उसे क्या मिलता है ?

युधिष्ठिर उवाच।

प्रियवचनवादी प्रीयो भवति

विमृशितकार्यकरोऽधिकं जयति।

बहुमित्रकरः सुखं वसत

यश्च धर्मरतः स गतिं लभते ॥

  • युधिष्ठिर बोले- मधुर वचन बोलने वाला सबको प्रिय होता है, सोच विचार कर काम करने वाले को अधिकतर सफलता मिलती है एवं जो बहुत से मित्र बना लेता है, वह सुख से रहता है और जो धर्मनिष्ठ है, वह सद्गति पाता है।

यक्ष उवाच।

कोमोदतेकिमाश्चर्यं कः पन्थाः का च वार्तिका।

वद मे चतुरः प्रश्नान्मृता जीवन्तु बान्धवाः ॥

  • यक्ष ने पूछा- सुखी कौन है ? आश्चर्य क्या है ? मार्ग क्या है तथा वार्ता क्या है ? मरम इन चार प्रश्नों का उत्तर देकर जल पीओ।

युधिष्ठिर उवाच

पञ्चमेऽहनि षष्ठे वा शाकं पचति स्वे गृहे।

अनृणी रचाप्रवासी चस वारिचर मोदते ॥

अहन्यहनि भूतानि गच्छन्तीह यमालयम्।

शेषाः स्थावरमिच्छन्ति किमाश्चर्यमतः परम् ॥

तर्कोऽप्रतिष्ठः श्रुतयो विभिन्ना

नैको मुनिर्यस्य मतं प्रमाणम्।

धर्मस्य तत्त्वं निहितं गुहायां

महाजनो येन गतःस पन्था ॥

पृथ्वी विभाण्डं गगनं पिघानं

सूर्याग्निना रात्रिदिवेन्धनेन।

मासर्तुदर्वीपरिघट्टनेन

भूतानि कालः पचतीति वार्ता ॥

  • युधिष्ठिर बोले- जलचर यक्ष ! जिस पुरुष पर ऋण नहीं बचे हुए हैं और जो परदेश में नहीं है, वह भले ही पाँचवें या छठे दिन अपने घर के भीतर साग-भात ही पकाकर खाता हो, तो भी वही सुखी है।
    संसार से रोज-रोज प्रणी यमलोक में जा रहे हैं; किंतु जो बचे हुए हैं, वे सर्वदा जीते रहने की इच्छा करते हैं; इससे बढ़कर आश्चर्य और क्या होगा ?
    तर्क कहीं सिथत नहीं है, श्रुतियाँ भी भिन्न-भिन्न हैं, एक ही ऋषि नहीं है कि जिसका मत प्रमाण माना जाय तथा धर्म का तत्त्व गुहा में निहित है अर्थात् अत्यन्त गूढ़ है; अतः जिससे महापुरुष जाते रहे हें, वही मार्ग है।
    इस महामोहरूपी कड़ाहे में भगवान काल समसत प्राणियों को मास और ऋतुरूप करछी से उलट-पलटकर सूर्यरूप अग्नि और रात-दिनरूप ईंधन के द्वारा राँध रहे हैं, यही वार्ता है।

यक्ष उवाच।

व्याख्याता मे त्वया प्रश्ना यथातत्वं परंतप।

पुरुषं त्विदानींव्याख्याहि यश्च सर्वधनी नरः ॥

  • यक्ष ने पूछा- परंतप ! तुमने मेरे सब प्रश्नों के उत्तर ठीक-ठीक दे दिये, अब तुम पुरुष की भी व्याख्या कर दो और यह बाताओ कि सबसे बड़ा धनी कौन है ?

युधिष्ठिर उवाच।

दिवं स्पृशति भूमिं च शब्दः पुण्येन कर्मणा।

यावत्स शब्दो भवति तावत्पुरुष उच्यते ॥

तुल्ये प्रियाप्रिये यस् सुखदुःखे तथैव च।

अतीतानागते चोभे सवै पुरुष उच्येत ॥

`समत्वं यस्य सर्वेषु निस्पृहः शान्तमानसः।

सुप्रसन्नः सदा योगी स वै सर्वधनी नरः’ ॥

  • युधिष्ठिर बोले- जिस व्यक्ति के पुण्य कर्मों की कीर्ति का शब्द जब तक स्वर्ग और भूमि को स्पर्श करता है, तब तक वह पुरुष कहलाता है। जो मनुष्य प्रिय-अप्रिय, सुख-दुःख और भूत-भविष्यत् इन द्वन्द्वों में सम है, वही सबसे बड़ा धनी है। जो भूत, वर्तमान और भविष्य सभी विषयों की ओर से निःस्पृह, शान्तचित्त, सुप्रसन्न और सदा योगयुक्त है, वही सब धनियों का स्वामी है।

इस प्रकार महामना युधिष्ठिर ने यक्ष रूपी धर्म के सभी प्रशनो के उत्तर बहुत ही प्रशंसनीय तरीके से दिया जिसके परिणाम स्वरूप उन्हें उनके चारों भाई जीवित मिल गए

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लेख संदर्भ - गीता प्रेस एवं दक्षिणात्य महाभारत

पढ़े आगे!

यक्ष प्रश्न – परिणाम

Post Author: Mahabharata World

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