सूर्य नारायण – अन्नदाता

छठ के पावन पर्व की हार्दिक शुभकामनाएँ !

क्यों छठ पर्व में भगवान सूर्य की पूजा की जाती है?

सृष्टि के प्रारम्भकाल में जब प्राणी भूख से अत्यन्त व्याकुल हो रहे थे, तब भगवान सूर्य ने पिता की भाँति उन सब पर दया करके उत्तरायण में जाकर अपनी किरणों से पृथ्वी का रस ( जल ) खींचा और दक्षिणायण में लौटकर पृथ्वी को उस रस से प्रविष्ट किया। इस प्रकार सारे भूमण्डल में क्षेत्र तैयार हो गया तब औषधीय स्वामी चन्द्रमा ने अन्तरिक्ष मेघों के रूप में परिणत हुए सूर्य के तेज को प्रकट करके उसके द्वारा बरसाये हुए जल से अन्न आदि औषधियों को उत्पन्न किया। चन्द्रमा की किरणों से अभिशक्त हुआ सूर्य जब अपनी प्रकृति में स्थित हो जाता है तब छः प्रकार के रसों से युक्त जो पवित्र औषधियां उत्पन्न होती हैं, वही पृथ्वी में प्राणियों के लिये अन्न होता है।

इस प्रकार सभी जीवों के प्राणों की रक्षा करने वाला अन्न सूर्य रूप ही है। अतः भगवान सूर्य ही समस्त प्राणियों के पिता हैं, इसलियेहमे उन्हीं की शरण में ही जाना चाहिए। जो जन्म और कर्म दोनों ही दृष्टियों से परम उज्ज्वल हैं ऐसे महात्मा राजा भारी तपस्या का आश्रय लेकर सम्पूर्ण प्रजाजनों का संकट से उद्धार करते हैं। भीम, कार्तवीर्य, अर्जुन, वेनपुत्र पृथु तथा नहुष आदि नरेशों के तपस्या योग और समाधि में स्थित होकर भारी आपत्तियों से प्रजा को उबारा था।

धौम्य ने महात्मा युधिष्ठिर को भगवान सूर्य के एक सौ आठ नाम बताये थे जो इस प्रकार है ।

धौम्य कहते है;

  1. सुर्य, 2. अर्यमा, 3. भग, 4. त्वष्टा, 5. पूषा, 6. अर्क, 7. सविता, 8. रवि, 9. गमस्मिान्, 10. अज, 11. काल, 12. मृत्यु, 13. धाता, 14. प्रभाकर, 15. पृथ्वी, 16. आप, 17. तेज, 18. ख (आकाश) , 19. वायु, 20. परायण, 21. सोम, 22. बृहस्पति, 23. शुक्र, 24. बुध, 25. अंगारक(मंगल) , 26. इन्द्र, 27. विवस्वान, 28. दीप्तांशुं, 29. शुचि, 30. शौरि, 31. शनैश्वर, 32. ब्रह्म, 33. विष्णु, 34. रूद्र, 35. स्कन्द, 36. वरूण, 37. यम, 38. वैद्युताग्रि, 39. जाठराग्नि, 40. ऐन्धनाग्नि, 41. तेजःपति, 42. धर्मध्वज, 43. वेदकर्ता, 44. वेदांग, 45. वेदवाहन, 46. कृत, 47. त्रेता, 48. द्वापर, 49. सर्वमलाश्रय कलि, 50. कला काष्ठा मुहर्त-रूप समय, 51. क्षपा (रात्रि) , 52. याम, 53. क्षण, 54. संवत्सरकर, 55. अश्वत्थ, 56. कालचक्र प्रवर्तक विभावसु, 57. शाश्वत पुरूष, 58. योगी, 59. व्यक्ताव्यक्त, 60. सनातन, 61. कालाध्यक्ष, 62. प्रजाध्यक्ष, 63. विश्वकर्मा, , 64. तमानुद, 65. वरूण, 66. सागर, 67. अंशु, 68. जीमूत, 69. जीवन, 70. अरिहा, 71. भूताश्रय, 72. भूतपति, 73. सर्वलोकनमज्ञकत, 74. स्त्रष्टा, 75. संवर्तक, 76. वह्रि, 77. सर्वादि, 78. अलोल्लन, 79. अनन्त, 80. कपिल, 81. भानु, 82. कामद, 83. सर्वतोमुख, 84. जय, 85. विशाल, 86. वरद, 87. सर्वधातु, 88. मनःसुपर्ण, 89. भूतादि, 90. शीघ्रग, 91. प्राणधारक, 92. धन्वतरि, 93. धूमकेतु, 94. आादिदेव, 95. आदितिसेतु, 96. द्वादशात्मा, 97. अरविन्दाक्ष, 98. पिता-माता-पितामह, 99. स्वर्गद्वार-प्रजाद्वार, 100. मोक्षद्वार, 101. देहकर्ता, 102. प्रशान्तात्मा, 103. विश्वात्मा, 104. विश्वतोमुख, 105. चराचरात्मा, 106. सूक्ष्मात्मा, 107. मैत्रेय, 108. करूणान्वित।

ये अमिततेजस्वी भगवान सूर्य के कीर्तन करने योग्य एक सौ आठ नाम हैं जिनका उपदेश साक्षात् ब्रह्मजी ने दिया है। इन नामों का उच्चारण करके भगवान सूर्य को इस प्रकार नमस्कार करना चाहिये।

सुरगणपितृयक्षसेवितं ह्यसुरनिशाचरसिद्धवन्दितम्।

वरकनकहुताशनप्रभं त्वमपि मनस्यभिधेहि भास्करम् ॥

  • समस्त देवता, पितर और यक्ष जिनकी सेवा करते हैं असुर,राक्षस तथा सिद्ध जिनकी वन्दना करते हैं तथा जो उत्तम सुवर्ण और अग्नि के समान कान्तिमान् हैं उन भगवान भास्कर को मैं हित के लिए प्रणाम करता हूँ।

 

सूर्योदये यः सुसमाहितः पठेत्त पुत्रदारान्धनरत्नसंचयान्।

लभेत जातिस्मरतां नरः सदा धृतिं च मेधां च स विन्दते पुमान् ॥

  • जो मनुष्य सूर्योदय के समय भली भाँति एकाग्रचित हो इन नामों का पाठ करता है वह स्त्री, पुरूष, रत्नराशि, पूर्वजन्म की स्मृति,धैय तथा उत्तम बुद्धि प्राप्त कर लेता है।

 

इमं स्तवं देववरस्य यो नरः प्रकीर्तयेच्छुचिसुमनाः समाहितः।

स मुच्यते शोकदवाग्निसागराल्लभेत कामान्मनसा यथेप्सितान् ॥

  • जो मानव स्नान आदि करके पवित्र, शुद्धचित्त एवं एकाग्र हो देवेश्वर भगवान सूर्य के इस नामात्मक स्त्रोत का कीर्तन करता है वह शोक रूपी दानव से युक्त दुष्कर संसार सागर से मुक्त हो मनचाही वस्तुओं को प्राप्त कर लेता है।

युधिष्ठिर के द्वारा भगवान सूर्य का स्तवन

पुरोहित धौम्य के इस प्रकार समयोचित बात कहने पर ब्राह्मणों को देने के लिये अन्न की प्राप्ति के उद्देश्य से नियम में स्थित होकर दृढ़ता पूर्वक व्रत का पालन करते हुए शुद्ध चेतना से धर्मराज युधिष्ठिर ने उत्तम तपस्या का अनुष्ठान आरम्भ किया।

राजा युधिष्ठिर ने गंगा जी के जल से पुष्प और नैवेद्य आदि उपहारों द्वारा भगवान दिवाकर की पूजा की और उनके सम्मुख मुँह करके खड़े हो गये। धर्मात्मा पाण्डु कुमार चित्त को एकाग्र करके इंद्रियों को संयम में रखते हुए केवल वायु पीकर रहने लगे। गंगा जल का आचमन करके पवित्र हो वाणी को वश में रखकर तथा प्राणायामपूर्वक स्थित रहकर पूर्वोत्तर अष्टोत्तरशतनामात्मक स्तोत्र का जप किया।

युधिष्ठिर बोले –

त्वं भानो जगतश्चक्षुस्त्वमात्मा सर्वदेहिनाम्।

त्वं योनिः सर्वभूतानां त्वमाचारः क्रियावतां ॥

  • सूर्यदेव आप सम्पूर्ण जगत के नेत्र तथा समस्त प्राणियों की आत्मा हैं। आप ही सब जीवों की उत्पत्ति-स्थान और कर्मानुष्ठान में लगे हुए पुरुषों के सदाचार हैं।

 

त्वं गतिः सर्वसाङ्ख्यानां योगिनां त्वं परायणम्।

अनावृतार्गलद्वारं त्वं गतिस्त्वं मुमुक्षताम् ॥

  • सम्पूर्ण सांख्ययोगियों के प्राप्तव्य स्थान पर ही हैं। आप ही सब कर्मयोंगियों के आश्रय हैं। आप ही मोक्ष के उन्मुक्त द्वार हैं और आप ही मुमुक्षुओं की गति हैं।

 

त्वया संधार्यते लोकस्त्वया लोकः प्रकाश्यते।

त्वयापवित्रीक्रियते निर्व्याजं पाल्यते त्वया ॥

  • आप ही सम्पूर्ण जगत को धारण करते हैं। आप से ही यह प्रकाशित होता है। आप ही इसे पवित्र करते हैं और आप के ही द्वारा निःस्वार्थ भाव से उसका पालन किया जाता है।

 

सूर्यदेव ! आप सभी ऋषिगणों द्वारा पूजित हैं। वेद के तत्वश ब्राह्मण लोग अपनी-अपनी वेद शाखओं में वर्णित मंत्रों द्वारा उचित समय पर उपस्थान करके आपका पूजन किया करते हैं। सिद्ध, चारण, गन्धर्व, यक्ष, गुह्यक और नाग आप से वर पाने की अभिलाषा से आपके गतिशील दिव्य रथ के पीछे-पीछे चलते हैं। तैंतीस देवता एवं विमानचारी सिद्ध गण भी उपेन्द्र तथा महेन्द्र सहित आपकी अराधना करके सिद्धि को प्राप्त हुए हैं।

श्रेष्ठ विद्याधरगण दिव्य मन्दार-कुसुमों की मालाओं से आपकी पूजा करके सफल मनोरथ हो तुरंत आपके समीप पहुँच जाते हैं। गुह्यक,सात प्रकार के पितृगण तथा दिव्य मानव (सनकादि) आपकी ही पूजा करके श्रेष्ठ पद को प्राप्त करते हैं। वसुगण, मरूद्रगण, रूद्र, साध्य तथा आपकी किरणों का पान करने वाले वालखिल्य आदि सिद्ध महर्षि आपकी ही आराधना से सब प्राणियों में श्रेष्ठ हुए हैं। ब्रह्मलोक सहित ऊपर के सातों लोकों में तथा अन्य सब लोकों में भी ऐसा कोई प्राणी नही,दिखता जो आप भगवान सूर्य से बढ़कर हो।

सन्ति चान्यानि सत्वानिवीर्यवन्ति महान्ति च।

न तु तेषां तथा दीप्तिः प्रभावो वायथा तव ॥

ज्योतीषित्वयि सर्वाणि त्वं सर्वज्योतिषां पतिः।

त्वयिसत्त्वं च सत्त्वं च सर्वेभावाश्च सात्त्विकाः ॥ 

त्वत्तेजसा कृतंचक्रं सुनाभं विश्वकर्मणा।

देवारीणां मदो येन नाशितः शार्ङ्गधन्वना ॥

  • भगवन ! जगत में और बहुत से प्राणी हैं परंतु उनकी कांति और प्रभाव आपके समान नहीं हैं। सम्पूर्ण ज्योर्तिमय पदार्थ आपके ही अंर्तगत हैं । आप ही समस्त ज्योंतियों के स्वामी हैं। सत्य, सत्व तथा समस्त सात्विकभाव आप में ही प्रतिष्ठित हैं। शांर्ग नामक धनुष धारण करने वाले भगवान विष्णु ने जिसके द्वारा घमंड चूर्ण किया है उस सुदर्शन चक्र को विश्वकर्मा ने आप के ही तेज से बनाया है।

 

आप ग्रीष्म-ऋतु में अपनी किरणों से समस्त देहधारियों से तेज और सम्पूर्ण औषधियों के रस का सार खींचकर पुनः उसे वर्षाकाल में उसे बरसा देते हैं। वर्षा ऋतु में आपकी कुछ किरणें तपती हैं, कुछ जलाती हैं कुछ मेघ बनकर गरजती हैं बिजली बनकर चमकती हैं तथा वर्षा भी करती हैं।

शीत काल की वायु से पीड़ित जगत को अग्नि, कम्बल और वस्त्र भी उतना सुख नहीं देते, जितना आप की किरणें देती हैं। आप अपनी किरणों द्वारा तेरह द्वीपों से युक्त सम्पूर्ण पृथ्वी को प्रकाशित करते हैं व अकेले ही तीनों लोकों के हित के लिए तत्पर रहते हैं। यदि आप उदय न हों तो सारा जगता अंधा हो जाये और मनीषी पुरुष धर्म, अर्थ एवं काम संबंधी कर्मों में से प्रवृत्त न हों।

गर्भाधान या अग्नि की स्थापना, पशुओं को बाँधना, इष्टि(पूजा), मन्त्र, यज्ञानुष्ठान, और तप आदि समस्त क्रियाएँ आपकी ही कृपा से ब्राह्मण, क्षत्रय और वैश्यगणों द्वारा सम्पन्न की जाती हैं। ब्रह्मजी का जो एक सहस्त्र युगों का दिन बताया गया है, कालमान के जानने वाले विद्वानों ने उसका आदि अन्त आपको बताया है।

मनु और मनु पुत्रों के जगत के (ब्रह्मलोक प्राप्ति कराने वाले ) अमानव पुरुष के समस्त मनवन्तरों के तथा ईश्‍वरों के भी ईश्‍वर भी आप हैं। प्रलयकाल आने पर आप के ही क्रोध से प्रकट हुई संवर्तक नामक अग्नि तीनों लोकों को भस्म करके फिर आपस में ही स्थित हो जाती है। आपकी ही किरणों से उत्पन्न हुए रंग एरावत हाथी महामेघ और बिजलियाँ सम्पूर्ण भूतों का संहार करती हैं। फिर आप ही अपने को महामेघ और बिजली रूप में सम्पूर्ण भूतों का संहार करते हुए एकार्णव के समस्त जल को सोख लेते हैं।

त्वामिन्द्रमाहुस्त्वं रुद्रस्त्वं विष्णुस्त्वं प्रजापतिः।

त्वमग्निस्त्वं मनः सूक्ष्मं प्रभुस्त्वं ब्रह्मशाश्वतं ॥ 

  • आपको ही इन्द्र कहते हैं। आप ही रूद्र, आप ही विष्णु और आप ही प्रजापति हैं। अग्नि, सूक्ष्म मन, प्रभु, तथा सनातन ब्रह्म भी आप ही हैं।

 

आप ही हंस (शुद्ध स्वरूप), सविता (जगत की उत्पत्ति करने वाले), भानु (प्रकाशमान), अंशुमाली (किरण समूह से सुशोभित), वृषाकपि (धर्मरक्षक), विवस्वान् (सर्वव्यापी), मिहिर (जल की वृष्टि करने वाले ), पुषा (पषक), मित्र (सब के सुह्रद्) , धर्म ( धारण करने वाले ), सहस्त्ररश्मि (हजारों किरणों वाले), आदित्य (अदिति पुत्र), तपन (तापकारी), गवाम्पति (किरणें के स्वामी ), मर्तण्ड, अर्क (अर्चनीय), रवि, सूर्य (उत्पादक), शरणय (शरणागति की रक्षा करने वाले), दिनकृत् (दिन के कर्ता), दिवाकर (दिन को प्रकट करने वाले), सप्तसप्ति (सात घोड़ो वाले ), धामकेशी (ज्योर्तिमयी किरणों वाले), विरोचन (देदीप्यमान), आशुगामी (शीघ्रगामी) तमोघ्न (अन्धकार नाशक) तथा हरिताश्व (हरे रंग के घोड़ो वाले ) कहे जाते हैं।

जो सप्तमी अथवा अष्टमी को खेद अहंकार भक्तिभाव से आपकी पूजा करता है उस मनुष्य को लक्ष्मी प्राप्त होती है। भगवन ! जो अनन्य चित्त से आपकी अर्चना और वन्दना करते हैं, उन पर कभी आपत्ति नहीं आती। वे मानसिक चिंताओं तथा रोगों से भी ग्रस्त न‍हीं होते हैं। जो प्रेमपूर्वक आपके प्रति भक्ति रखते हैं वे समस्त रोगों तथा पापों से रहित हो चिरंजीव एवं सुखी होते हैं।

अन्नपते ! मैं श्रद्धापूर्वक सबका आतिथ्य करने की इच्छा से अन्न प्राप्त करना चाहता हूँ। आप मुझे अन्न देने की कृपा करें।आपके चरणों के निेकट रहने वाले जो माठर, अरुण तथा दण्ड आादि अनुचर (गण)हैं, वे विद्युत के प्रवर्तक हैं। मैं उन सबकी वन्दना करता हूँ। क्षुभा साथ जो मैत्रीभाव से तथा गौरी-पह्मा आदि अन्य भूताएँ हैं, उन सब को नमस्कार करता हूँ। वे मेरी व सभी शरणागत की रक्षा करें।


जब युधिष्ठिर ने लोकभावन भगवान भास्कर का इस प्रकार स्तवन किया, तब दिवाकर ने प्रसन्न होकर उन पाण्डु कुमारों को दर्शन दिया उस समय उनके श्री अंग प्रज्वलित अग्नि के समान उद्भासित हो रहे थे।

भगवान सूय बोले-

धर्मराज ! तुम जो कुछ चाहते हो, वह सब तुम्हें प्राप्त होगा। मैं बारह वर्षों तक तुम्हें अन्न प्रदान करूँगा। राजन ! यह मेरी दी हुई ताँबे की बटलोई लो। सुवत ! तुम्हारे रसोई घर में इस पात्र द्वारा फल‌- मूल भोजन करने के योग्य अन्य पदार्थ तथा साग आदि जो चार प्रकार की भोजन-सामग्री तैयार होगी, वह तब तक अक्षय बनी रहेगी, जब तक द्रौपदी स्वयं भोजन न करके परोसती रहेगी। आज से चैदहवें वर्ष में तुम अपना राज्य पुनः प्राप्त कर लोगे।

इतना कहकर भगवान सूर्य वहीं अंर्तधान हो गये। जो कोई अन्य पुरूष भी मन को संयम में रखकर चित्तवृत्तियों को एकाग्र करके इस स्तोत्र का पाठ करेगा वह यदि कोई अत्यन्त दुर्लभ वर भी माँगे तो भगवान सूर्य उसकी मनवांछित वस्तु को दे सकते हैं। जो प्रतिदिन इस स्तोत्र को धारण करता अथवा बार-बार सुनता है, वह यदि पुत्रार्थी हो तो पुत्र पाता है, धन चाहता है तो धन पाता है, विद्या की अभिलाषा रखता हो तो उसे विद्या प्राप्त होती है और पत्नी की इच्छा रखने वाले पुरुष को पत्नी सुलभ होती है।

स्त्री हो या पुरुष यदि दोनों समय इस स्तोत्र का पाठ करता है तो आपत्ति में पड़कर भी उससे मुक्त हो जाता है। बन्धन में पड़ा हुआ मनुष्य बन्धन से मुक्त हो जाता है। यह स्तुति सबसे पहले ब्रह्यजी ने महात्मा इन्द्र को दी, इन्द्र से नारद जी से धौम्य ने इसे प्राप्त किया। धौम्य से इसका उपदेश पाकर राजा युधिष्ठिर ने अपनी सब कामनाएँ प्राप्त कर लीं। जो इसका अनुष्ठान करता है ,वह सदा संग्राम में विजयी होता है, बहुत धन पाता है, सब पापों से मुक्त होता है और अन्त में सूर्यलोक को जाता है।

वर पाकर धर्म के ज्ञाता कुन्ती नन्दन युधिष्ठिर गंगाजी के जल से बाहर निकले। उन्होंने धौम्य जी के दोनों चरण पकड़े और भाइयों को ह्रदय से लगा लिया। द्रौपदी ने उन्हें प्रणाम किया और वे उससे प्रेमपूर्वक मिले। फिर उसी समय पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर ने चूल्हे पर बटलोई रखकर रसोई तैयार कराई। द्रौपदी ने उन्हें प्रणाम किया और वे उससे प्रेमपूर्वक मिले। फिर उसी समय पाण्डुनन्दन युधिष्ठिर के प्रभाव से थोड़ी-सी रसोई उस पात्र में बढ़ गई और अक्षय हो गई।

उसी से वे बाह्यणों को भोजन कराने लगे। बाह्यणों के भोजन कर लेने पर अपने छेाटे भाईयों को भी कराने के पश्चात विघस अवशिष्ट अन्न को युधिष्ठिर सबसे पीछे खाते थे। युधिष्ठिर के भोजन को कर लेने पर द्रौपदी शेष अन्न स्वयं खाती थी। द्रौपदी के भोजन कर लेने पर उस पात्र का अन्न समाप्त हो जाता था। इस प्रकार सूर्य से मनोवांछित वरों को पाकर उन्हीं के समान तेजस्वी प्रभावशाली राजा युधिष्ठिर ब्राह्यणों को नियमपूर्वक अन्न दान करने लगे।

जय सूर्य नारायण

Post Author: Mahabharata World

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